उत्तर प्रदेश का धान का खेत — यूरिया की किश्तें इसी अवस्था को देखकर तय की जाती हैं, तारीख देखकर नहीं।
कल्ला और गाभ — यूरिया के दो असली मौके
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20–25 दिन
पहली टॉप ड्रेसिंग
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45–50 दिन
दूसरी टॉप ड्रेसिंग
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बाली के बाद
यूरिया बिल्कुल नहीं
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भूमिका
धान के खेत में यूरिया कब डाली जाए — यह सवाल हर रोपाई के बाद उठता है, और इसी एक फैसले पर उपज का बड़ा हिस्सा टिका होता है। यूरिया सही दिन पर पड़े तो कल्ले बढ़ते हैं और बालियाँ भरी निकलती हैं; गलत दिन पर पड़े तो वही खाद पत्ती बढ़ाकर फसल गिरा देती है और कीट-रोग बुला लेती है।
सबसे महँगी गलतफहमी यह है कि "यूरिया जितनी जल्दी और जितनी ज़्यादा, उतना अच्छा"। असल में धान को नाइट्रोजन दो खास मौकों पर चाहिए — जब कल्ले फूट रहे हों, और जब बाली बननी शुरू हो रही हो। इस लेख में रोपाई के दिन से गिनकर पूरा कार्यक्रम है — कौन सी किश्त किस दिन, कितने किलो, और किस हालत में यूरिया बिल्कुल नहीं डालनी।
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सीधा जवाब — तीन किश्तें, तीन मौके
सामान्य उन्नत किस्म के रोपाई वाले सिंचित धान में यूरिया तीन किश्तों में दी जाती है, और तीनों का समय पौधे की अवस्था से तय होता है, कैलेंडर की तारीख से नहीं।
पहली किश्त — रोपाई के समय (बेसल): आखिरी पडलिंग या रोपाई के 2-3 दिन के भीतर, कुल यूरिया का लगभग आधा।
दूसरी किश्त — रोपाई के 20-25 दिन बाद: जब कल्ले फूट रहे हों। यही वह किश्त है जो कल्लों की संख्या तय करती है।
तीसरी किश्त — रोपाई के 45-50 दिन बाद: जब गाभ यानी बाली बननी शुरू हो रही हो। यही किश्त दाने भरती है।
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1 एकड़ में पूरे सीज़न की कुल यूरिया करीब 105 किलो, यानी 45 किलो वाली 2.3 बोरी। इसे मोटे तौर पर 50 किलो + 28 किलो + 27 किलो में बाँटा जाता है। हाइब्रिड धान में यह बढ़कर करीब 132 किलो और बासमती में घटकर लगभग 79 किलो हो जाती है।
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रोपाई के कितने दिन बाद यूरिया डालें
किसान अक्सर दिन गिनकर काम करता है, इसलिए नीचे वही हिसाब दिन के हिसाब से दिया गया है। मात्रा एक एकड़ की है, और यह मानकर चली है कि पूरी नाइट्रोजन यूरिया से दी जा रही है।
रोपाई से दिन
फसल की अवस्था
कुल का हिस्सा
यूरिया प्रति एकड़
0–3 दिन
रोपाई / बेसल
लगभग 50%
~50 किलो
20–25 दिन
कल्ले फूटना (टिलरिंग)
लगभग 25%
~28 किलो
45–50 दिन
गाभ / बाली बनना
लगभग 25%
~27 किलो
बाली निकलने के बाद
फूल व दाना भरना
कुछ नहीं
यूरिया न डालें
लंबी अवधि की किस्मों में तीसरी किश्त 50-55 दिन तक खिसक सकती है, और कम अवधि की किस्मों में यह 40 दिन के आसपास ही आ जाती है। तारीख नहीं, फसल देखकर तय कीजिए — गाभ बनने का समय ही तीसरी किश्त का सही समय है।
⚠️
मात्रा किस्म, अवधि और मिट्टी के हिसाब से बदलती है — ब्लास्ट यानी झुलसा रोग वाले इलाकों में नाइट्रोजन जानबूझकर कम रखने की सलाह दी जाती है। अपनी मिट्टी जाँच रिपोर्ट और नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग की सिफारिश से एक बार मिलान ज़रूर कर लीजिए।
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धान में यूरिया कितनी बार डालनी चाहिए
दो से तीन बार — इससे ज़्यादा नहीं, और एक बार में तो बिल्कुल नहीं। कितनी बार डालनी है यह किस्म की अवधि से तय होता है।
लंबी और मध्यम अवधि की किस्में (125 दिन से ऊपर): तीन किश्तें — बेसल, कल्ले और गाभ।
कम अवधि की किस्में (100-115 दिन): दो किश्तें काफी हैं — बेसल और कल्ले के समय, और तीसरी छोटी किश्त तभी जब पत्तियाँ पीली दिखें।
बासमती और सुगंधित किस्में: कुल नाइट्रोजन कम, और आखिरी किश्त हल्की — ज़्यादा नाइट्रोजन पर बासमती लंबी होकर गिर जाती है और खुशबू पर असर पड़ता है।
पूरी यूरिया एक बार में डालने पर उसका बड़ा हिस्सा या तो अमोनिया गैस बनकर उड़ जाता है या पानी के साथ बह जाता है, और बाद में जब बाली बन रही होती है तब खेत भूखा रह जाता है। किश्तों का पूरा गणित एकड़-बीघा के हिसाब वाले लेख में है।
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पानी का प्रबंधन — यूरिया बचाने का मुफ़्त तरीका
धान में सबसे बड़ा नुकसान खाद की मात्रा से नहीं, पानी के गलत प्रबंधन से होता है। भरे और बहते पानी में डाली गई यूरिया नाली के रास्ते खेत से ही बाहर निकल जाती है, और किसान को पता तक नहीं चलता।
पहले पानी का निकास बंद कीजिए: यूरिया डालने से पहले खेत का बहाव रोक दीजिए और 1-2 दिन तक पानी बाहर न जाने दें।
पानी की परत उथली रखिए: 2-3 सेंटीमीटर की हल्की परत सबसे अच्छी है। लबालब भरे खेत में डाली खाद ऊपर ही तैरती रहती है।
सूखे खेत में डालनी पड़े तो: डालने के तुरंत बाद हल्की सिंचाई कीजिए, वरना सतह पर पड़ी यूरिया की नाइट्रोजन का बड़ा हिस्सा गैस बनकर उड़ जाता है।
तेज़ बारिश के अनुमान पर टाल दीजिए: हल्की बारिश यूरिया को मिट्टी में उतारती है, पर तेज़ बारिश उसे खेत से बहा ले जाती है।
अंदाज़े से यूरिया डालने की जगह पौधे की पत्ती देखकर फैसला करना ज़्यादा भरोसेमंद है, और इसमें कोई खर्च नहीं आता।
देखने की बात
✅ ठीक नाइट्रोजन
❌ गड़बड़ी
पत्ती का रंग
सामान्य हरा
फीका पीला (कमी) या गहरा नीला-हरा (अधिकता)
कौन सी पत्ती पहले पीली
कोई नहीं
नीचे की पुरानी पत्तियाँ पहले — यही नाइट्रोजन की कमी है
पौधे की बनावट
सीधा, मज़बूत तना
मुलायम, लंबा, हवा-पानी में गिरने वाला
कल्लों की संख्या
भरपूर और एक जैसे
कम कल्ले, कमज़ोर बढ़वार
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पत्ती रंग चार्ट (LCC) धान में नाइट्रोजन तय करने का सबसे सस्ता वैज्ञानिक तरीका है — सबसे ऊपर की पूरी खुली पत्ती का रंग चार्ट के तय शेड से नीचे गिरे, तभी अगली किश्त दीजिए। ऊपर की नई पत्तियाँ पीली हों तो वह नाइट्रोजन नहीं, आमतौर पर जिंक या गंधक की कमी होती है — उस पर यूरिया डालने से कुछ नहीं होगा।
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पहली टॉप ड्रेसिंग के साथ क्या डालें
धान में नाइट्रोजन अकेली पूरी कहानी नहीं है। यह देश के बड़े हिस्से में जिंक की कमी वाली फसल है, और जिंक की कमी में यूरिया का असर भी अधूरा रह जाता है।
जिंक सल्फेट: जिंक की कमी वाले खेतों में लगभग 10 किलो प्रति एकड़ (25 किलो प्रति हेक्टेयर), रोपाई के 15-20 दिन बाद यूरिया के साथ बिखेरकर।
पोटाश: जहाँ सिफारिश हो, आधी मात्रा बेसल में और आधी कल्ले फूटते समय — इससे तना मज़बूत होता है और फसल कम गिरती है।
बालू या सूखी मिट्टी में मिलाकर: कम मात्रा को पूरे खेत में बराबर बिखेरने का सबसे आसान तरीका, खासकर जिंक जैसी छोटी मात्राओं के लिए।
खरपतवारनाशी के साथ यूरिया न मिलाएँ: दोनों का सही समय और सही तरीका अलग है, मिलाने पर असर घट जाता है।
⚠️
जिंक और पोटाश की मात्रा तभी दीजिए जब मिट्टी जाँच में कमी दिखे या कृषि विभाग ने आपके इलाके के लिए सिफारिश की हो। बिना ज़रूरत डाली गई खाद पैसा भी लेती है और मिट्टी का संतुलन भी बिगाड़ती है।
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ये गलतियाँ कभी न करें
बाली निकलने के बाद यूरिया डालना — इस अवस्था में नाइट्रोजन दाने नहीं भरती, सिर्फ़ पत्ती बढ़ाती है, फसल गिराती है और कीट बुलाती है।
बहते पानी में यूरिया बिखेरना — नाइट्रोजन नाली से बहकर खेत के बाहर चली जाती है; पहले निकास बंद कीजिए।
पूरी बोरी एक ही बार में डाल देना — शुरू में बहती है और बाद में फसल भूखी रह जाती है।
"खेत ज़्यादा हरा है तो अच्छा है" मान लेना — गहरा नीला-हरा रंग ज़्यादा नाइट्रोजन की निशानी है, और इसी हालत में भूरा फुदका और झुलसा सबसे तेज़ी से फैलते हैं।
ओस या बारिश से भीगी पत्तियों पर दाने गिराना — दाने चिपककर पत्ती जला देते हैं और भूरे धब्बे बना देते हैं, जिन्हें अक्सर रोग समझ लिया जाता है।
दोपहर की तेज़ धूप में डालना — गरम हवा और तपती मिट्टी में अमोनिया सबसे तेज़ उड़ती है; सुबह या शाम का समय बेहतर है।
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सीधी बुवाई और अलग-अलग किस्मों में क्या बदलता है
खेती का तरीका / किस्म
कुल यूरिया प्रति एकड़
खास बात
रोपाई वाला सामान्य धान
~105 किलो
तीन किश्तें — 0, 20-25 और 45-50 दिन
हाइब्रिड धान
~132 किलो
माँग ज़्यादा, पर आखिरी किश्त फिर भी गाभ तक ही
बासमती / सुगंधित
~79 किलो
ज़्यादा नाइट्रोजन पर गिरती है, इसलिए कम और हल्की किश्तें
बेसल कम, किश्तें ज़्यादा — बुवाई, 20-25 दिन और 40-45 दिन पर
सीधी बुवाई में खेत शुरू में सूखा रहता है, इसलिए वहाँ यूरिया हमेशा सिंचाई या बारिश से पहले या नम मिट्टी में ही डालनी चाहिए — सूखी सतह पर बिखेरी खाद का बड़ा हिस्सा उड़ जाता है।
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रोपाई से कटाई तक — पूरा कार्यक्रम
समय
ज़रूरी काम
रोपाई से पहले
आखिरी पडलिंग में फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी बेसल मात्रा मिलाएँ
रोपाई के 0–3 दिन
कुल यूरिया का लगभग आधा, उथले पानी में, निकास बंद रखकर
10–15 दिन
खरपतवार नियंत्रण; खाली जगहों पर पौधे भरें
15–20 दिन
जिंक की कमी दिखे तो जिंक सल्फेट ~10 किलो प्रति एकड़
20–25 दिन
दूसरी किश्त — कल्ले फूटते समय ~28 किलो यूरिया प्रति एकड़
30–40 दिन
तना छेदक और फुदका की निगरानी; ज़्यादा हरा खेत खतरे का संकेत
45–50 दिन
तीसरी किश्त — गाभ बनते समय ~27 किलो यूरिया प्रति एकड़
बाली निकलने के बाद
यूरिया बंद; अब सिर्फ़ पानी और कीट-रोग प्रबंधन
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निष्कर्ष
तीन बातें याद रखिए। पहली — धान में यूरिया तीन किश्तों में: रोपाई पर, 20-25 दिन पर और 45-50 दिन पर। दूसरी — डालने से पहले खेत का निकास बंद कीजिए और पानी की परत उथली रखिए। तीसरी — बाली निकलने के बाद यूरिया का काम खत्म।
धान में यूरिया की तारीख कैलेंडर से नहीं, खेत को देखकर तय होती है — कल्ला और गाभ, यही दो मौके असली हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1धान में यूरिया कब डालना चाहिए?
रोपाई वाले धान में यूरिया तीन बार दी जाती है — रोपाई के समय, रोपाई के 20-25 दिन बाद जब कल्ले फूट रहे हों, और 45-50 दिन बाद जब गाभ यानी बाली बन रही हो। बाली निकल आने के बाद यूरिया डालने का कोई फायदा नहीं, उससे सिर्फ़ पत्ती बढ़ती है और फसल गिरने का खतरा बढ़ता है।
2धान की रोपाई के कितने दिन बाद यूरिया डालें?
पहली टॉप ड्रेसिंग रोपाई के 20-25 दिन बाद और दूसरी 45-50 दिन बाद करनी चाहिए। कम अवधि वाली किस्मों में यह समय थोड़ा पहले, लगभग 18-20 और 40 दिन पर आ जाता है, जबकि लंबी अवधि की किस्मों में आखिरी किश्त 50-55 दिन तक खिसक सकती है।
3धान में यूरिया कितनी बार डालनी चाहिए?
दो से तीन बार, इससे ज़्यादा नहीं। मध्यम और लंबी अवधि की किस्मों में तीन किश्तें — बेसल, कल्ले और गाभ — और कम अवधि की किस्मों में दो किश्तें काफी रहती हैं। एक ही बार में पूरी यूरिया डालने पर उसका बड़ा हिस्सा गैस बनकर उड़ जाता है या पानी के साथ बह जाता है।
4धान में 1 एकड़ में कितना यूरिया डालना चाहिए?
सामान्य उन्नत किस्म के सिंचित धान में 1 एकड़ पर पूरे सीज़न में करीब 105 किलो यूरिया, यानी 45 किलो वाली 2.3 बोरी — मोटे तौर पर रोपाई पर 50 किलो, कल्ले फूटते समय 28 किलो और गाभ बनते समय 27 किलो। हाइब्रिड धान में यह करीब 132 किलो और बासमती में लगभग 79 किलो रहती है।
5धान में पहली यूरिया के साथ क्या डालें?
जिंक की कमी वाले खेतों में पहली टॉप ड्रेसिंग के आसपास लगभग 10 किलो जिंक सल्फेट प्रति एकड़ यूरिया या सूखी मिट्टी में मिलाकर बिखेरा जाता है, क्योंकि धान में जिंक की कमी बहुत आम है। पोटाश की आधी मात्रा भी इसी समय दी जा सकती है, पर खरपतवारनाशी को यूरिया के साथ नहीं मिलाना चाहिए।
6धान में यूरिया डालने के बाद कितने दिन में पानी देना चाहिए?
धान में सही तरीका पानी बाद में देना नहीं, बल्कि पहले खेत का निकास बंद करके 2-3 सेंटीमीटर की उथली परत में यूरिया डालना और 1-2 दिन तक पानी बाहर न जाने देना है। अगर खेत सूखा है तो डालने के तुरंत बाद हल्की सिंचाई कीजिए, क्योंकि सूखी सतह पर पड़ी यूरिया की नाइट्रोजन का बड़ा हिस्सा अमोनिया बनकर उड़ जाता है।
7क्या बाली आने के बाद धान में यूरिया डाल सकते हैं?
नहीं। बाली निकलने के बाद डाली गई यूरिया दाने नहीं भरती — वह सिर्फ़ पत्तियाँ बढ़ाती है, पौधे को मुलायम बनाकर गिरा देती है और भूरा फुदका जैसे कीट व झुलसा जैसे रोग को न्योता देती है। नाइट्रोजन का आखिरी उपयोगी मौका गाभ बनने का समय है, यानी रोपाई के लगभग 45-50 दिन बाद।
8धान की सीधी बुवाई (DSR) में यूरिया कब डालें?
सीधी बुवाई में कुल मात्रा लगभग वही रहती है, पर बेसल हिस्सा कम रखकर किश्तें बढ़ाई जाती हैं — बुवाई के समय, फिर 20-25 दिन और 40-45 दिन पर। सबसे ज़रूरी बात यह है कि DSR का खेत शुरू में सूखा रहता है, इसलिए यूरिया हमेशा नम मिट्टी में या सिंचाई-बारिश से ठीक पहले डालनी चाहिए।
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