आलू का पछेती झुलसा
Potato Late Blight (Phytophthora infestans) — Causes, Symptoms & Management
आलू की पत्तियों पर पानी से भीगे जैसे भूरे-काले धब्बे और नीचे सफेद रुई जैसी फफूंद — यह पछेती झुलसा है। अनुकूल मौसम में यह सिर्फ 5–7 दिनों में पूरा खेत चौपट कर देता है। सही पहचान और समय पर बचाव से इसे रोका जा सकता है।
✍️ Kunal Rajput — KrashiMitra⏱️ 7 मिनट पढ़ें📅 जुलाई 2026
आलू की पत्ती पर पछेती झुलसा (Late Blight) — किनारों से शुरू होकर फैलने वाले भूरे-काले धब्बे।
आलू की सबसे विनाशकारी बीमारी — पछेती झुलसा
📉
5–7 दिन
में पूरा खेत चौपट
🌫️
ठंड + कोहरा
सबसे खतरनाक मौसम
🧪
मैंकोजेब
बचाव की मुख्य दवा
📖
भूमिका
आलू भारत की सबसे महत्वपूर्ण सब्ज़ी फसल है — उत्तर प्रदेश (आगरा, फर्रुखाबाद, कन्नौज), पश्चिम बंगाल, पंजाब और बिहार में लाखों किसान इस पर निर्भर हैं। और आलू की सबसे विनाशकारी बीमारी है पछेती झुलसा (Late Blight), जिसे किसान "आलू का झुलसा" भी कहते हैं।
यह वही रोग है जिसने इतिहास में आयरलैंड का भीषण अकाल पैदा किया था। यह इतना तेज़ है कि अनुकूल (ठंडा-नम-बादल) मौसम में सिर्फ 5–7 दिनों में पूरा खेत झुलसा सकता है और पत्ती से कंद तक पहुँचकर भंडारण में भी सड़न कर देता है। इस लेख में हम आलू के पछेती झुलसा की पूरी जानकारी देंगे — पहचान, कारण, नुकसान और रोकथाम — सरल हिंदी में।
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आलू का पछेती झुलसा क्या है?
पछेती झुलसा (Late Blight) आलू की सबसे विनाशकारी बीमारी है। यह Phytophthora infestans नामक फफूंद-जैसे जीव (oomycete / water mold) से होता है। इसके बीजाणु (sporangia) हवा, ओस और बारिश की छींटों के साथ फैलते हैं और नम मौसम में बिजली की तेजी से बढ़ते हैं।
पहले पत्तियों पर पानी से भीगे जैसे धब्बे बनते हैं, फिर नम मौसम में इनके नीचे सफेद रुई जैसी फफूंद उग आती है। कुछ ही दिनों में पूरा पौधा काला होकर झुलस जाता है, और रोग कंद (आलू) तक पहुँचकर उसे भी सड़ा देता है।
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इस रोग की सबसे बड़ी बात इसकी रफ्तार है — अनुकूल मौसम में यह हर 3–5 दिन में दोगुना फैलता है। इसीलिए बचाव (मौसम देखकर पहले से छिड़काव) ही असली इलाज है, न कि रोग दिखने के बाद की दवा।
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रोग के कारण
पछेती झुलसा नियंत्रण के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि यह रोग क्यों और कब भड़कता है:
ठंडा-नम-बादल वाला मौसम: 10–20°C तापमान, अधिक आर्द्रता, कोहरा और लगातार बादल रोग को तेजी से बढ़ाते हैं — यही मुख्य कारण है।
हवा और ओस से बीजाणु: बीजाणु हवा से उड़कर और ओस/बारिश की छींटों से एक पौधे से दूसरे तक पहुँचते हैं।
संक्रमित बीज-कंद: रोगग्रस्त बीज-आलू लगाने से रोग शुरू से ही खेत में आ जाता है।
अधिक सिंचाई और पानी का ठहराव: खेत में ज़्यादा नमी रोग के लिए अनुकूल है।
संवेदनशील किस्में: बिना रोग-रोधकता वाली किस्में (जैसे कुफरी ज्योति) जल्दी संक्रमित होती हैं।
घनी बुवाई: पास-पास लगे पौधों के बीच नमी बनी रहती है, जिससे रोग तेजी से फैलता है।
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पहचान और लक्षण — कैसे जानें कि रोग लग गया है?
🍃 पत्तियों पर लक्षण (सबसे पहले यहीं दिखता है)
पत्तियों के किनारों और सिरों पर पानी से भीगे जैसे गहरे भूरे-काले धब्बे बनते हैं।
नम मौसम में धब्बे के नीचे (निचली सतह पर) सफेद रुई जैसी फफूंद दिखती है।
धब्बे तेजी से बढ़कर पूरी पत्ती को झुलसा देते हैं।
🌿 तने और पूरे पौधे पर
तने पर भी भूरे-काले धब्बे बनते हैं और पौधा गिरने लगता है।
कुछ ही दिनों में पूरा खेत झुलसा और काला दिखने लगता है।
खेत से सड़न जैसी गंध आने लगती है।
🥔 कंद (आलू) पर लक्षण
आलू की सतह पर भूरे-बैंगनी धँसे हुए धब्बे बनते हैं।
काटने पर अंदर भूरी, जंग जैसी सड़न दिखती है।
ऐसे आलू भंडारण में भी सड़ जाते हैं और बाज़ार में नहीं बिकते।
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रोग कैसे फैलता है?
हवा से बीजाणु: फफूंद के बीजाणु हवा के साथ एक खेत से दूसरे खेत तक तेजी से उड़ते हैं — यही मुख्य तरीका है।
ओस और बारिश की छींटें: पत्तियों पर टिकी नमी में बीजाणु अंकुरित होकर अंदर घुसते हैं।
संक्रमित बीज-कंद: रोगग्रस्त आलू से रोग शुरू से ही खेत में मौजूद रहता है।
सिंचाई का पानी: संक्रमित खेत का पानी बीजाणुओं को मिट्टी और कंद तक पहुँचाता है।
संक्रमित मलबा: खेत में पड़े रोगग्रस्त पत्ते-कंद अगली फसल के लिए स्रोत बनते हैं।
ℹ️
जैसे ही मौसम ठंडा, नम और बादल वाला हो और सुबह देर तक कोहरा/ओस रहे — समझ लें कि झुलसा का खतरा सबसे ज़्यादा है। ऐसे में रोग दिखने का इंतज़ार न करें, पहले से बचाव छिड़काव कर दें।
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नुकसान — कितना खतरनाक है यह रोग?
⚠️
यह रोग सबसे तेज़ फैलने वाला है — 5–7 दिनों में पूरा खेत खत्म कर सकता है। पत्ती से कंद तक पहुँचकर यह खेत और भंडारण दोनों में नुकसान करता है। गंभीर हालत में 40–80% तक उपज बर्बाद हो सकती है। इसीलिए मौसम देखकर पहले से बचाव सबसे ज़रूरी है।
नीचे दी गई तालिका से स्वस्थ और झुलसा-ग्रस्त आलू की फसल की पहचान आसानी से की जा सकती है:
पहचान बिंदु
✅ स्वस्थ फसल
❌ झुलसा-ग्रस्त फसल
पत्तियाँ
एक-सी हरी, साफ
पानी जैसे भूरे-काले धब्बे
पत्ती की निचली सतह
साफ, सूखी
सफेद रुई जैसी फफूंद (नमी में)
तना
हरा, सीधा
काले धब्बे, गिरता हुआ
खेत की गंध
सामान्य
सड़न जैसी गंध
कंद (आलू)
साफ, चिकना
भूरे धँसे धब्बे, अंदर सड़न
उपज
अच्छी, बाज़ार योग्य
बहुत कम, भंडारण में भी सड़न
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रोकथाम के उपाय
रोग-रोधी किस्में चुनें: कुफरी गिरिराज, कुफरी हिमालिनी, कुफरी बादशाह — क्षेत्र अनुसार KVK से पुष्टि करें।
स्वस्थ बीज-कंद लगाएं: प्रमाणित, रोगमुक्त बीज-आलू ही चुनें; कटे/सड़े कंद न लगाएं।
अच्छी मिट्टी चढ़ाएं (earthing up): ऊँची मेड़ बनाएं ताकि बीजाणु कंद तक न पहुँच सकें।
मौसम पर नज़र: ठंडा-नम-बादल वाला मौसम आते ही बचाव छिड़काव की तैयारी करें।
अधिक सिंचाई न करें: खेत में ज़्यादा नमी न रहने दें; हल्की और ज़रूरत भर सिंचाई करें।
घनी बुवाई से बचें: उचित दूरी रखें ताकि हवा लगे और पत्तियाँ जल्दी सूखें।
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जैविक व बचाव उपाय
🌱
पछेती झुलसा बहुत तेज़ है, इसलिए जैविक उपाय मुख्यतः बचाव और मिट्टी-सुधार के लिए हैं — रोग भड़कने पर फफूंदनाशक ज़रूरी हो जाता है।
रोग-रोधी किस्म ही सबसे भरोसेमंद बचाव है।
ट्राइकोडर्मा: मिट्टी उपचार से पौधे की जड़ मजबूत होती है।
खेत की सफाई: संक्रमित पत्ते-कंद तुरंत हटाकर नष्ट करें — ये रोग का स्रोत हैं।
अच्छी जल निकासी: खेत में पानी न ठहरने दें, यह रोग को धीमा करता है।
🧪
रासायनिक नियंत्रण
यहाँ रणनीति दो हिस्सों में है — रोग से पहले "बचाव" दवा (मैंकोजेब) और रोग दिखने पर "सिस्टेमिक" दवा:
दवाई का नाम
मात्रा
कब / तरीका
मैंकोजेब 75% WP
2.5 ग्राम/लीटर
बचाव — रोग आने से पहले (मौसम अनुकूल होते ही)
साइमोक्सानिल + मैंकोजेब
3 ग्राम/लीटर
रोग दिखने पर (सिस्टेमिक)
मेटालैक्सिल + मैंकोजेब
2.5 ग्राम/लीटर
तेज संक्रमण पर
डाइमेथोमोर्फ + मैंकोजेब
3 ग्राम/लीटर
छिड़काव, 7–10 दिन बाद दोहराएं
⚠️
रोग दिखने से पहले मैंकोजेब का बचाव छिड़काव सबसे कारगर है। रोग आने पर सिस्टेमिक दवा दें और एक ही दवा बार-बार न दोहराएं। किसी भी रसायन से पहले नजदीकी KVK या कृषि विभाग से सलाह ज़रूर लें।
🌱
बीज-कंद और बुवाई — बचाव की शुरुआत
पछेती झुलसा से बचाव की शुरुआत स्वस्थ बीज-कंद और सही बुवाई से होती है:
प्रमाणित, रोगमुक्त बीज-कंद: हमेशा भरोसेमंद स्रोत से स्वस्थ आलू ही बीज के रूप में लगाएं।
रोग-रोधी किस्म: कुफरी गिरिराज/हिमालिनी जैसी किस्में झुलसा से बेहतर बचाव देती हैं।
समय पर बुवाई: अनुशंसित समय पर बुवाई करें ताकि फसल की संवेदनशील अवस्था अधिक-नमी वाले मौसम में न पड़े।
ऊँची मेड़ बनाएं: अच्छी मिट्टी चढ़ाने से बीजाणु कंद तक नहीं पहुँच पाते।
🚜
खेत प्रबंधन
मौसम आधारित निगरानी: ठंडा-नम-बादल वाला मौसम आते ही रोज़ खेत देखें और बचाव छिड़काव करें।
अच्छी मिट्टी चढ़ाना (earthing up): कंद को बीजाणुओं से बचाने का सबसे अच्छा तरीका।
संतुलित सिंचाई: ज़्यादा पानी न दें; खेत में नमी न ठहरने दें।
हौल्म कटाई: खुदाई से 10–15 दिन पहले संक्रमित पत्ती-तना (हौल्म) काटकर हटा दें ताकि कंद संक्रमित न हों।
सूखे मौसम में खुदाई: खेत गीला होने पर खुदाई न करें; कंद को सुखाकर ही भंडारण करें।
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विशेषज्ञ सलाह
💡
मौसम देखकर पहले से मैंकोजेब का छिड़काव करें — झुलसा में यही सबसे बड़ा बचाव है।
ठंडी-कोहरे वाली सुबहों में खेत की रोज़ जाँच करें।
रोग दिखते ही सिस्टेमिक दवा पर तुरंत जाएं, देर न करें।
नजदीकी KVK से क्षेत्र की रोग-रोधी किस्म और दवा की जानकारी लें।
किसान कॉल सेंटर: +91 9870951001 — निःशुल्क।
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निष्कर्ष
आलू का पछेती झुलसा बहुत तेज़ी से फैलने वाली विनाशकारी बीमारी है, लेकिन सही रणनीति से इसे रोका जा सकता है। तीन बातें याद रखें: रोग-रोधी किस्म और स्वस्थ बीज-कंद चुनें, अच्छी मिट्टी चढ़ाएं, और मौसम अनुकूल होते ही मैंकोजेब का बचाव छिड़काव कर दें — रोग दिखने का इंतज़ार न करें।
एक सतर्क किसान ही सफल किसान होता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1आलू का पछेती झुलसा किससे होता है?
आलू का पछेती झुलसा (Late Blight) Phytophthora infestans नामक फफूंद-जैसे जीव (oomycete) से होता है। इसके बीजाणु हवा, ओस और बारिश की छींटों से फैलते हैं और ठंडे-नम-बादल वाले मौसम में कुछ ही दिनों में पूरी फसल चौपट कर सकते हैं।
2आलू के पछेती झुलसा की पहचान कैसे करें?
पत्तियों के किनारों और सिरों पर पानी से भीगे जैसे गहरे भूरे-काले धब्बे बनते हैं। नम मौसम में इन धब्बों के नीचे (पत्ती की निचली सतह पर) सफेद रुई जैसी फफूंद दिखती है। तेजी से पूरी पत्ती और तना झुलस जाता है और खेत से सड़न जैसी गंध आने लगती है।
3पछेती झुलसा इतना खतरनाक क्यों है?
अनुकूल (ठंडा-नम-बादल) मौसम में यह रोग बहुत तेजी से फैलता है और केवल 5–7 दिनों में पूरा खेत झुलसा सकता है। यह पत्ती से कंद (आलू) तक पहुँचकर भंडारण में भी सड़न पैदा करता है — इसी तेजी के कारण यह आलू की सबसे विनाशकारी बीमारी है।
4पछेती झुलसा किस मौसम में आता है?
ठंडा, नम और बादल वाला मौसम (10–20°C), अधिक आर्द्रता, कोहरा और ओस पछेती झुलसा के लिए सबसे अनुकूल हैं — यानी उत्तर भारत में दिसंबर–जनवरी। लगातार बादल और हल्की बूँदाबाँदी सबसे बड़ा खतरा है।
5पछेती झुलसा की सबसे असरदार दवा कौन सी है?
बचाव के लिए मैंकोजेब 75% WP (2.5 ग्राम/लीटर) रोग आने से पहले छिड़कें। रोग दिख जाने पर सिस्टेमिक दवा — साइमोक्सानिल+मैंकोजेब या मेटालैक्सिल+मैंकोजेब — का प्रयोग करें और 7–10 दिन बाद दोहराएं।
6क्या मौसम देखकर पहले से छिड़काव करना चाहिए?
हाँ — यही सबसे कारगर तरीका है। जब मौसम ठंडा, नम और बादल वाला हो जाए, तो रोग दिखने का इंतज़ार किए बिना मैंकोजेब का बचाव छिड़काव कर दें, क्योंकि झुलसा दिखने के बाद बहुत तेजी से फैलता है।
7कौन सी आलू किस्म झुलसा से सुरक्षित है?
कुफरी गिरिराज, कुफरी हिमालिनी और कुफरी बादशाह जैसी किस्में पछेती झुलसा के प्रति अपेक्षाकृत प्रतिरोधी मानी जाती हैं। अपने क्षेत्र के लिए सही किस्म की पुष्टि नजदीकी KVK या कृषि विभाग से करें।
8कंद (आलू) को सड़न से कैसे बचाएं?
अच्छी मिट्टी चढ़ाएं (earthing up) ताकि बीजाणु कंद तक न पहुँचें, संक्रमित पत्ती-तना (हौल्म) खुदाई से 10–15 दिन पहले काटकर हटा दें, और खेत गीला होने पर खुदाई न करें। स्वस्थ, प्रमाणित बीज-कंद ही लगाएं।
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